शिमला। हिमाचल प्रदेश में स्थानीय स्वशासन की दिशा में राज्य सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए पंचायती राज विभाग के माध्यम से 60 नई ग्राम पंचायतों के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है। मंगलवार देर शाम जारी की गई इस अधिसूचना के साथ ही प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां और तेज हो गई हैं। सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच को बेहतर बनाना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को जमीनी स्तर तक सुदृढ़ करना है। इस नई अधिसूचना के तहत राज्य के सभी जिलों में नई पंचायतों के सृजन का मार्ग प्रशस्त हुआ है, जिस पर अब आम जनता से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की गई हैं।
तीन दिन के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे गए
पंचायती राज विभाग द्वारा जारी अधिसूचना में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करते हुए प्रदेश के नागरिकों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया है। नई पंचायतों के गठन और उनके भौगोलिक क्षेत्रों के निर्धारण को लेकर यदि किसी नागरिक या समूह को कोई आपत्ति है, तो वे अगले तीन दिनों के भीतर अपनी राय विभाग के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, लोग नई पंचायतों के नाम या उनकी सीमाओं को लेकर अपने रचनात्मक सुझाव भी दे सकते हैं। इन तीन दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद, विभाग प्राप्त सभी आपत्तियों और सुझावों का गहन विश्लेषण करेगा और उसके उपरांत ही पंचायतों के गठन की अंतिम अधिसूचना जारी की जाएगी।
दो दिन में 133 नई पंचायतों का गठन
हिमाचल प्रदेश सरकार पिछले कुछ दिनों से पंचायत पुनर्गठन की प्रक्रिया पर अत्यंत तीव्र गति से कार्य कर रही है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले महज दो दिनों के भीतर राज्य सरकार ने कुल 133 नई पंचायतों के गठन के आदेश जारी किए हैं। इस व्यापक पुनर्गठन के बाद हिमाचल प्रदेश में ग्राम पंचायतों की कुल संख्या बढ़कर 3777 हो जाएगी। पंचायतों की संख्या में हुई इस वृद्धि से ग्रामीण विकास कार्यों में तेजी आने और स्थानीय स्तर पर धन के आवंटन व प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता आने की उम्मीद जताई जा रही है। वर्तमान में पंचायतों के पुनर्सीमांकन का कार्य भी युद्ध स्तर पर चल रहा है ताकि प्रत्येक क्षेत्र की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति के अनुसार न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन
हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव कराने को लेकर समय सीमा का निर्धारण उच्चतम न्यायालय द्वारा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव किसी भी स्थिति में 31 मई से पहले संपन्न करा लिए जाने चाहिए। इसी न्यायिक आदेश के दबाव और संवैधानिक बाध्यता को देखते हुए राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग सक्रिय मोड में हैं। नई पंचायतों का गठन और पुनर्सीमांकन इसी चुनावी प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है, जिसे समय रहते पूरा किया जाना आवश्यक है।
राज्य निर्वाचन आयुक्त की समीक्षा बैठक
चुनाव तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए राज्य निर्वाचन आयुक्त अनिल खाची ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण उच्च स्तरीय बैठक की। इस बैठक में शहरी विकास, ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। अनिल खाची ने बैठक के दौरान चुनावी तैयारियों की वर्तमान स्थिति की विस्तृत समीक्षा की और अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्वाचन प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी क्योंकि यह सीधे तौर पर न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन होगा।
31 मार्च तक आरक्षण रोस्टर पूरा करने के निर्देश
निर्वाचन आयुक्त अनिल खाची ने अधिकारियों को एक महत्वपूर्ण समय सीमा (डेडलाइन) देते हुए निर्देश दिया कि 31 मार्च तक आरक्षण रोस्टर लागू करने की पूरी प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से संपन्न कर लिया जाए। आरक्षण रोस्टर वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से यह तय किया जाता है कि कौन सी पंचायतें महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षित होंगी। चुनावी निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए आरक्षण रोस्टर का समय पर जारी होना अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही, उन्होंने नई पंचायतों के गठन के संबंध में अब तक हुई प्रगति की एक विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की है।
नगर निकायों के चुनाव पर भी मंथन
निर्वाचन आयोग की इस समीक्षा बैठक में केवल ग्रामीण पंचायतों तक ही चर्चा सीमित नहीं रही, बल्कि प्रदेश के 21 नए नगर निकायों के चुनाव कराने पर भी गहन विमर्श किया गया। हालांकि, इन नगर निकायों के चुनाव को लेकर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन अधिकारियों ने इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया और तैयारियों का ब्योरा राज्य चुनाव आयुक्त के समक्ष रखा। सरकार की मंशा है कि ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में लोकतांत्रिक निकायों का गठन समय पर पूरा हो जाए।
समय सीमा के भीतर कार्य पूरा करने की चुनौती
अनिल खाची ने बैठक में मौजूद अधिकारियों को सचेत किया कि सभी संबंधित सरकारी विभाग समन्वय के साथ कार्य करें। उन्होंने कहा कि न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी कार्यों को सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि चुनाव प्रक्रिया बिना किसी तकनीकी या कानूनी बाधा के निर्बाध रूप से संपन्न हो सके। पंचायतों के पुनर्गठन से लेकर मतदाता सूचियों के अपडेशन और आरक्षण रोस्टर तक के सभी कार्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए इनमें से किसी भी एक चरण में देरी पूरी चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश में नई पंचायतों के गठन की अधिसूचना जारी होने के बाद अब गेंद जनता के पाले में है। अगले तीन दिन ग्रामीण राजनीति के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। जैसे ही अंतिम अधिसूचना जारी होगी, राज्य निर्वाचन आयोग मई में चुनाव कराने की अपनी योजना को अमलीजामा पहनाना शुरू कर देगा। ग्रामीण स्तर पर प्रशासनिक इकाइयों के इस विस्तार से आम जनता को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अधिक सुलभ मंच मिलने की संभावना है।