नई दिल्ली। बांग्लादेश के आम चुनाव के परिणामों ने पड़ोसी देश की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया है। 17 वर्षों के लंबे निर्वासन के बाद स्वदेश लौटे तारिक रहमान की पार्टी ‘बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी’ (बीएनपी) ने बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर लिया है। चुनाव नतीजों के अनुसार, बीएनपी अब तक 151 से अधिक सीटों पर विजय प्राप्त कर चुकी है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि तारिक रहमान बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे। यह जीत तारिक रहमान के लिए न केवल राजनीतिक पुनर्वापसी है, बल्कि उनके दशकों लंबे संघर्ष और कानूनी लड़ाइयों का परिणाम भी है।
तारिक रहमान बांग्लादेश के एक रसूखदार राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता जिया-उर-रहमान बीएनपी के संस्थापक और देश के पूर्व राष्ट्रपति थे, जबकि उनकी मां खालिदा जिया तीन बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रह चुकी हैं। 20 नवंबर 1965 को ढाका में जन्मे तारिक का बचपन भी संघर्षों से भरा रहा। 1971 की आजादी की जंग के दौरान महज चार साल की उम्र में उन्हें हिरासत में लिया गया था। राजनीति में उनकी सक्रियता 1991 से बढ़ी, जब उन्होंने अपनी मां के चुनाव अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
तारिक रहमान का सफर आसान नहीं रहा; उन्हें 17 वर्षों तक लंदन में स्वनिर्वासन में रहना पड़ा। साल 2007 में भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तारी और जेल में मिली यातनाओं के बाद वे चिकित्सा के बहाने लंदन चले गए थे। उन पर हत्या और भ्रष्टाचार से जुड़े लगभग 84 मामले दर्ज थे, जिन्हें वे हमेशा राजनीतिक प्रतिशोध बताते रहे। लंदन में रहते हुए भी वे तकनीक के माध्यम से अपनी पार्टी का नेतृत्व करते रहे। साल 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश के कानूनी हालात बदले और 2026 की शुरुआत तक वे अधिकांश बड़े मामलों में बरी हो गए, जिसमें 2018 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा भी शामिल थी।
अदालती बाधाएं हटने के बाद तारिक रहमान दिसंबर 2025 में ढाका लौटे और अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस के साथ मिलकर नई राजनीतिक बिसात बिछाई। 13वें संसदीय चुनाव में उन्होंने अपने परिवार के पुश्तैनी गढ़ बोगुरा-6 और राजधानी ढाका-17, दोनों सीटों से ऐतिहासिक अंतर से जीत दर्ज की है। इन दोनों सीटों पर मिली जीत ने उनके राजनीतिक कद को और ऊंचा कर दिया है। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के चुनाव से बाहर रहने के कारण तारिक रहमान के लिए सत्ता की राह आसान हो गई, लेकिन अब प्रधानमंत्री के रूप में उनके सामने बांग्लादेश की अस्थिर अर्थव्यवस्था को संभालने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को दोबारा जीवित करने की बड़ी चुनौती होगी।
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