पटना। बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सोमवार को सरकारी अस्पतालों की दयनीय स्थिति का मुद्दा गरमा गया। इस बार सदन में विपक्ष के बजाय सत्तापक्ष की ही भाजपा विधायक मैथिली ठाकुर ने अपनी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने अपने क्षेत्र के सरकारी अस्पताल की जर्जर हालत और प्रशासनिक उदासीनता को लेकर स्वास्थ्य मंत्री को घेरा।
प्रश्नकाल के दौरान मैथिली ठाकुर का लहजा किसी सामान्य शिकायत के बजाय एक सख्त चेतावनी जैसा था। उन्होंने अस्पताल की बदहाली का विवरण देते हुए बताया कि इमारत की छतों से प्लास्टर गिर रहा है, दीवारों में बड़ी दरारें आ चुकी हैं और बरसात के मौसम में पानी टपकता है। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि ऐसी खतरनाक स्थिति में गर्भवती महिलाओं और बच्चों का इलाज करना उनकी जान से खिलवाड़ करने जैसा है। विधायक ने तंज कसते हुए पूछा कि जब हर साल स्वास्थ्य बजट में बढ़ोतरी की जा रही है, तो आखिर अस्पतालों की इमारतें क्यों गिर रही हैं। उनका तर्क था कि डॉक्टरों और दवाओं की कमी तो एक समस्या है ही, लेकिन अगर इलाज के दौरान अस्पताल की छत ही गिर जाए तो ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था किस काम की।
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने जवाब देते हुए कहा कि सरकार इस विषय पर गंभीर है और जर्जर भवनों की पहचान कर चरणबद्ध तरीके से मरम्मत और नवनिर्माण कराया जा रहा है। हालांकि, मैथिली ठाकुर इस जवाब से बिल्कुल संतुष्ट नजर नहीं आईं। उन्होंने तुरंत पलटवार करते हुए कहा कि उनके क्षेत्र का अस्पताल वर्षों से सरकारी सूची में शामिल है, लेकिन धरातल पर आज तक कुछ नहीं बदला। विधायक का ‘एक बार फिर समझाइए’ कहना सत्तापक्ष के लिए असहज स्थिति पैदा कर गया। उन्होंने न केवल भवन की स्थिति, बल्कि अस्पताल में एमबीबीएस डॉक्टरों और पर्याप्त जगह की कमी का मुद्दा भी पुरजोर तरीके से उठाया।
मैथिली ठाकुर ने तीखा प्रहार करते हुए पूछा कि क्या सरकार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है। उनका यह सवाल उस प्रशासनिक व्यवस्था पर चोट था जहाँ अक्सर किसी अनहोनी के बाद ही फाइलें आगे बढ़ती हैं। सदन में अपनी ही पार्टी की विधायक द्वारा मंत्री को कटघरे में खड़ा देख विपक्ष ने भी मेज थपथपाकर उनका समर्थन किया। इस बहस का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है, जिसे जनता का भारी समर्थन मिल रहा है। लोगों का मानना है कि यह स्थिति केवल एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की है। अब देखना यह है कि इस तीखी बहस के बाद सरकार धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई करती है या फिर यह मामला केवल आश्वासनों तक ही सीमित रह जाता है।
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