शिमला। हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर छिड़ी कानूनी और राजनीतिक खींचतान अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँच गई है। प्रदेश में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के समयबद्ध संचालन और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच एक बड़ा वैचारिक मतभेद उभरकर सामने आया है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा पंचायत चुनाव को लेकर दिए गए हालिया सख्त आदेश के बाद राज्य सरकार ने अब इस पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है। सरकार की ओर से दायर इस विशेष अनुमति याचिका के बाद अब सबकी नजरें दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी हैं, जहाँ यह तय होगा कि हिमाचल की पंचायतों का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
इस पूरे विवाद की जड़ में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का वह आदेश है, जिसमें राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वे प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं की चुनाव प्रक्रिया को हर हाल में 30 अप्रैल तक पूरा करें। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया था कि पंचायतों का चुनाव समय पर कराना केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है। अदालत ने प्रदेश प्रशासन को फटकार लगाते हुए कहा था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निरंतरता बनाए रखने के लिए समय पर मतदान कराना अनिवार्य है और इसमें किसी भी प्रकार की देरी को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के पीछे संविधान के अनुच्छेद 243-ई की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-ई के तहत यह प्रावधान किया गया है कि पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नए चुनाव संपन्न करा लेने चाहिए। संविधान में पांच साल का कार्यकाल निर्धारित किया गया है और इसे किसी भी स्थिति में बिना ठोस संवैधानिक आधार के आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। हाईकोर्ट का मानना है कि यदि निर्धारित समय के भीतर चुनाव नहीं कराए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन माना जाएगा।
मामले में एक और बड़ा कानूनी पेंच राज्य आपदा प्रबंधन अधिनियम को लेकर फंसा हुआ है। दरअसल, प्रदेश सरकार की ओर से चुनावों को टालने या देरी करने के पीछे अक्सर आपदा प्रबंधन से जुड़े आदेशों का सहारा लिया जाता रहा है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जारी किए गए कोई भी प्रशासनिक आदेश संवैधानिक जनादेश को दरकिनार नहीं कर सकते। न्यायपालिका का मानना है कि संविधान की शक्ति सर्वोच्च है और कोई भी अधिनियम या कार्यकारी आदेश संविधान द्वारा निर्धारित चुनावी समय सीमा को प्रभावित नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट के इस निर्णय ने राज्य सरकार के सामने एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। 30 अप्रैल तक चुनाव कराने का लक्ष्य हासिल करना सरकार के लिए काफी कठिन नजर आ रहा है, जिसके कारण ही अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। राज्य सरकार का तर्क है कि चुनाव आयोजित करने के लिए जमीनी स्तर पर कई तरह की तैयारियां और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है, जिन्हें पूरा करने में समय लग सकता है। इसके साथ ही, सरकार का यह भी मत है कि आपदा या अन्य विशेष परिस्थितियों में आपदा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधानों को ध्यान में रखना जरूरी है ताकि मतदान शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से संपन्न हो सके।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने और चुनाव कराने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की है। सरकार का प्रयास है कि वह सर्वोच्च अदालत को उन व्यावहारिक कठिनाइयों से अवगत कराए, जिनके कारण 30 अप्रैल की समय सीमा को पूरा करना उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों का तर्क है कि सरकार जानबूझकर चुनावों में देरी कर रही है ताकि वह अपने राजनीतिक लाभ के अनुसार समय चुन सके।
हिमाचल प्रदेश में पंचायतों का महत्व काफी अधिक है क्योंकि यहाँ की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। पंचायतों के माध्यम से ही विकास कार्य और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन धरातल पर होता है। ऐसे में यदि चुनाव समय पर नहीं होते हैं, तो ग्रामीण विकास की गति प्रभावित होने का डर बना रहता है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इसी बात को रेखांकित किया था कि ग्रामीण लोकतंत्र को सशक्त बनाए रखने के लिए समयबद्ध चुनाव अनिवार्य हैं।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई होने तक प्रदेश में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। राज्य चुनाव आयोग भी कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार कर रहा है ताकि वह अपनी तैयारियों को अंतिम रूप दे सके। यदि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है, तो सरकार को युद्ध स्तर पर तैयारियां शुरू करनी होंगी और अप्रैल के अंत तक मतदान प्रक्रिया संपन्न करानी होगी। वहीं, यदि सुप्रीम कोर्ट सरकार को कुछ राहत प्रदान करता है, तो चुनाव की तारीखें आगे बढ़ सकती हैं।
हिमाचल की इस कानूनी लड़ाई ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या प्रशासनिक मजबूरियां संवैधानिक जनादेश से ऊपर हो सकती हैं? हाईकोर्ट ने तो इसका उत्तर ‘नहीं’ में दिया है, लेकिन अब देश की सबसे बड़ी अदालत इस पर अपनी मुहर लगाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल हिमाचल प्रदेश, बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बनेगा, जहाँ अक्सर स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव विभिन्न कारणों से टाले जाते रहे हैं। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और फैसला यह तय करेंगे कि हिमाचल प्रदेश में लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई के चुनाव कब और कैसे संपन्न होंगे।