नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली-एनसीआर में घर खरीदारों के साथ हुई धोखाधड़ी के मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष निर्देश जारी करते हुए विशेष सीबीआई अदालत को आदेश दिया है कि वह बैंकों और बिल्डरों के बीच हुए अनैतिक गठजोड़ से संबंधित तीन आरोपपत्रों (चार्जशीट) पर दो सप्ताह के भीतर संज्ञान ले। अदालत ने स्पष्ट किया है कि घर खरीदारों को न्याय दिलाने के लिए मुकदमे की कार्यवाही में तेजी लाना अनिवार्य है। इस आदेश के बाद उन हजारों परिवारों में उम्मीद जगी है, जिन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई घर के सपने में लगा दी थी लेकिन धोखाधड़ी का शिकार हो गए।
यह मामला प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ के समक्ष आया। सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को मामले की प्रगति से अवगत कराया। उन्होंने पीठ को आश्वासन दिया कि केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा घर खरीदारों से जुड़े सभी 25 मामलों की जांच में मार्च 2026 तक काफी महत्वपूर्ण प्रगति कर ली जाएगी। भाटी ने यह भी बताया कि सीबीआई ने दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत में तीन महत्वपूर्ण आरोपपत्र पहले ही दाखिल कर दिए हैं, लेकिन अभी तक निचली अदालत द्वारा उन पर औपचारिक संज्ञान नहीं लिया गया है। इस पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधीनस्थ अदालत को 14 दिनों के भीतर प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।
पूरे मामले की पृष्ठभूमि उस ‘सब्सिडी योजना’ से जुड़ी है, जिसका उपयोग करके बिल्डरों और बैंकों ने मिलकर आम जनता को ठगा। पिछले साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस संबंध में 22 मामले दर्ज करने की अनुमति दी थी। इस योजना के तहत बैंक स्वीकृत ऋण राशि को सीधे घर खरीदार के बजाय बिल्डर के खाते में स्थानांतरित कर देते थे। समझौते के अनुसार, जब तक फ्लैट बनकर खरीदार को नहीं मिल जाता, तब तक उस ऋण की मासिक किश्तें (ईएमआई) बिल्डर को ही चुकानी थीं।
विवाद तब शुरू हुआ जब बिल्डरों ने किश्तों का भुगतान करना बंद कर दिया। इसके बाद बैंकों ने त्रिपक्षीय समझौते (ट्राइपार्टाइट एग्रीमेंट) की आड़ लेकर सीधे घर खरीदारों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया और उनसे पैसों की मांग की। बिल्डरों के भाग जाने या काम रोकने की स्थिति में घर खरीदारों पर दोहरी मार पड़ी—एक तरफ उनका घर नहीं मिला और दूसरी तरफ बैंकों के भारी कर्ज का बोझ उन पर लाद दिया गया।
मंगलवार को हुई सुनवाई में 1,200 से अधिक परेशान घर खरीदारों की याचिकाओं पर विचार किया गया। पीठ ने ऐश्वर्या भाटी और न्याय मित्र (अमीकस क्यूरी) राजीव जैन की दलीलों को सुनने के बाद कड़े निर्देश पारित किए। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को आदेश दिया कि वह दाखिल किए गए आरोपपत्रों की प्रतियां न्याय मित्र राजीव जैन के साथ साझा करें। न्याय मित्र इन दस्तावेजों का अध्ययन करेंगे और अदालत को जांच की निष्पक्षता व वर्तमान स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे। इसके साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को छूट दी है कि यदि जांच के दौरान आवश्यकता महसूस हो, तो और भी नई प्राथमिकियां (एफ़आईआर) दर्ज की जा सकती हैं।
अदालत ने बैंकों की जिम्मेदारी तय करते हुए एक और बड़ा आर्थिक निर्देश दिया। पीठ ने उन 23 बैंकों और वित्तीय संस्थानों को आदेश दिया है जिन्होंने इन संदिग्ध ऋण योजनाओं में भागीदारी की थी। इन सभी संस्थानों को न्याय मित्र और उनके कार्यालय द्वारा अदालत की सहायता में किए गए खर्चों की भरपाई के लिए 10-10 लाख रुपये जमा करने होंगे। यह राशि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के एक विशेष खाते में जमा की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से यह साफ हो गया है कि बैंकों और बिल्डरों की मनमानी अब और नहीं चलेगी। अदालत ने जिस तरह से समय सीमा निर्धारित की है और बैंकों पर वित्तीय जुर्माना लगाया है, वह देश के रियल एस्टेट क्षेत्र में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। आने वाले हफ्तों में निचली अदालत की कार्यवाही और सीबीआई की रिपोर्ट इस घोटाले की गहराई और इसमें शामिल बड़े चेहरों को बेनकाब करेगी। घर खरीदारों के संगठनों ने अदालत के इस सक्रिय रुख का स्वागत किया है।
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