चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा ने केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा को खत्म करके लाए गए विकसित भारत जी राम जी कानून के खिलाफ एक कड़ा रुख अपनाया है। विधानसभा ने आज बहुमत से एक प्रस्ताव पारित कर इस नए केंद्रीय कानून को सिरे से खारिज कर दिया। खास बात यह रही कि जब यह प्रस्ताव पारित हो रहा था तब सदन में भाजपा के एकमात्र सदस्य अश्विनी शर्मा मौजूद नहीं थे हालांकि उन्होंने बहस में हिस्सा लेते हुए मनरेगा की खामियां गिनाई थीं।
चार घंटे से ज्यादा चली इस मैराथन बहस में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के विधायकों ने एक सुर में नए कानून का विरोध किया। उन्होंने इसे संघीय ढांचे पर हमला बताते हुए कहा कि यह केंद्र सरकार की राज्यों का गला घोंटने की एक और चाल है। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि यह कानून अनुसूचित जाति के लोगों के साथ बड़ा धोखा है।
बहस का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने नए कानून के नाम पर तंज कसते हुए कहा कि अगर भविष्य में इस योजना में कोई घोटाला होता है तो क्या हम भगवान राम का नाम लेकर कहेंगे कि जी राम जी योजना में घोटाला हुआ है। मान ने इसे गरीब, दलित और राज्य विरोधी बताया। उन्होंने याद दिलाया कि मनमोहन सिंह ने जब मनरेगा कानून बनाया था तो उस पर लंबी बहस हुई थी लेकिन केंद्र सरकार ने महज 14 घंटों में पुराना कानून रद्द कर नया थोप दिया।
भगवंत मान ने कहा कि हम फसलों के लिए एमएसपी की मांग कर रहे हैं लेकिन केंद्र ने मजदूरों की लीगल गारंटी ही खत्म कर दी है। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां चार साल से मनरेगा का पैसा रोका गया है। मान ने अकाली दल पर भी निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने भाजपा की गलतियों पर चुप्पी साध रखी है।
वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने आरोप लगाया कि केंद्र की नीतियां संविधान की प्रस्तावना को कमजोर कर रही हैं और मजदूरों को गुलाम बनाने की साजिश रची जा रही है। इससे पहले ग्रामीण विकास मंत्री तरुणप्रीत सिंह सोंद ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि इस योजना से पंजाब पर 600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिंह ने इसे मुंह में राम बगल में छुरी बताया। निर्दलीय विधायक राणा इंद्रप्रताप सिंह ने चिंता जताई कि अब बजट और खर्च का फैसला केंद्र करेगा जो राज्यों के अधिकारों का हनन है।