नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों से बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब को पाकिस्तान से सीधे सैन्य सहयोग मिलने की उम्मीद फिलहाल पूरी होती दिखाई नहीं दे रही है। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान ने यमन में किसी प्रत्यक्ष सैन्य अभियान का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है। हालांकि, वह सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए रक्षा तंत्र उपलब्ध कराने में सहयोग कर सकता है। ऐसे हालात में रियाद ने हूती गतिविधियों से निपटने के लिए दूसरे देशों से सुरक्षा और खुफिया सहयोग की संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी हैं।
सऊदी अरब ने अगस्त में तुर्किए और पाकिस्तान के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता किया था। समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर होने वाले हमले को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाना है। इसके बावजूद पाकिस्तान ने यमन की जमीन पर सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने को अपनी सीमा बताया है।
रक्षा उपकरण और तंत्र तक सीमित रहेगा सहयोग
रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान हूती के खिलाफ अपने सैनिकों या रणनीतिक हथियारों को तैनात करने के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय वह सऊदी अरब की रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए सैन्य रक्षा प्रणालियों से जुड़े सहयोग की पेशकश कर सकता है। इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान सऊदी क्षेत्र की सुरक्षा में मदद कर सकता है, लेकिन यमन में चलने वाली किसी जमीनी सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल होने से बच रहा है।
ईरान समर्थित हूती संगठन यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है। लाल सागर और बाब अल-मंदेब क्षेत्र में उसकी गतिविधियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ समुद्री व्यापार को लेकर भी चिंता बढ़ाई है। सऊदी अरब की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए इन गतिविधियों का असर उसकी सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
इजरायल से खुफिया सहयोग की संभावना
पाकिस्तान के सीधे सैन्य अभियान से दूरी बनाने के बीच सऊदी अरब की नजर इजरायल के संभावित खुफिया और सुरक्षा सहयोग पर भी है। येरुशलम पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, रियाद ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड से दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कराने और हूती से मुकाबले के लिए खुफिया सहयोग उपलब्ध कराने में मदद मांगी है।
इजरायल हयोम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने क्षेत्र के अन्य देशों से भी सहयोग मांगा है। इनमें खाड़ी देशों के साथ मिस्र का नाम भी शामिल है। अमेरिका और ब्रिटेन भी हूती के खिलाफ प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई के बजाय खुफिया सूचनाओं और सैन्य सलाह जैसे सहयोग तक सीमित रहने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
औपचारिक संबंध नहीं फिर भी सहयोग की तलाश
सऊदी अरब और इजरायल के बीच फिलहाल औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं और सऊदी अरब ने इजरायल को मान्यता भी नहीं दी है। इसके बावजूद क्षेत्र में बदलते सुरक्षा हालात के बीच रियाद की ओर से संभावित खुफिया सहयोग की संभावना पर चर्चा हो रही है।
गाजा में युद्ध शुरू होने के बाद हूती ने लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों को निशाना बनाया है। अब सऊदी अरब भी हूती गतिविधियों से प्रभावित हो रहा है। ऐसे में रियाद के सामने एक जटिल कूटनीतिक स्थिति बन गई है, जहां उसे अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए ऐसे देश से संभावित सहयोग पर विचार करना पड़ रहा है जिसके साथ उसके अभी औपचारिक संबंध स्थापित नहीं हुए हैं।
फिलहाल सऊदी अरब के लिए चुनौती हूती के खतरे से निपटने के साथ-साथ क्षेत्रीय सहयोग का ऐसा ढांचा तैयार करना है, जिसमें अलग-अलग देशों की सैन्य और कूटनीतिक सीमाओं को भी ध्यान में रखा जा सके।
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