काठमांडू।
नेपाल में हाल ही में आई भीषण और विनाशकारी प्राकृतिक आपदा ने पूरे देश में तबाही का मंजर पैदा कर दिया है। नेपाल पुलिस द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस हृदयविदारक घटना में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1127 हो गई है। आपदा को एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी सुरक्षा बल और रेस्क्यू टीमें मलबे के नीचे दबे लोगों और लापता हजारों नागरिकों की तलाश में दिन-रात जुटी हुई हैं। पहाड़ों से लेकर मैदानी इलाकों तक फैली इस त्रासदी ने नेपाल के जनजीवन को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है।
पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, इस आपदा ने नेपाल के कई जिलों को अपनी चपेट में लिया है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में नुकसान की स्थिति बेहद भयावह है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि चितवन जिला इस त्रासदी का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है, जहां से अब तक सर्वाधिक 348 शव बरामद किए गए हैं। इसके अलावा अन्य प्रभावित जिलों की स्थिति भी चिंताजनक है। नवलपरासी पूर्व से 217, नवलपरासी पश्चिम से 190 और नुवाकोट से 155 शव मिले हैं। वहीं, गोरखा में 66, धादिङ में 59, रसुवा में 45 और तनहुं जिले में 38 लोगों की जान जाने की पुष्टि हुई है।
शवों की पहचान और उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। नेपाल पुलिस ने जानकारी दी है कि अब तक कुल 1113 शवों का पोस्टमॉर्टम और कानूनी पहचान की अनिवार्य प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। हालांकि, इनमें से केवल 95 शव ही उनके शोकाकुल परिजनों को सौंपे जा सके हैं। शेष 911 शवों की पहचान अभी तक नहीं हो पाई है। प्रशासन ने इन अज्ञात शवों के विवरण, शारीरिक निशान और तस्वीरें नेपाल पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर साझा की हैं, ताकि आपदा में बिछड़ गए लोगों के परिजन उनकी शिनाख्त कर सकें।
इस महासंकट से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने अपनी पूरी मशीनरी झोंक दी है। अब तक सुरक्षा बलों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए प्रभावित दुर्गम इलाकों से 6541 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया है। हालांकि, चिंता का विषय यह है कि 4858 लोग अब भी लापता हैं, जिनके जीवित बचने की उम्मीदें समय बीतने के साथ कम होती जा रही हैं। लापता लोगों की तलाश के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन लगातार चलाया जा रहा है। प्रभावित क्षेत्रों में खोज, बचाव, राहत सामग्री के वितरण और शवों के प्रबंधन के लिए कुल 7912 पुलिसकर्मियों को मैदान में उतारा गया है। ये टीमें न केवल मलबे से रास्ते साफ कर रही हैं, बल्कि हाई-रिस्क वाले संवेदनशील इलाकों में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने का काम भी कर रही हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, इस भीषण तबाही की शुरुआत 26 अगस्त को हुई थी, जब नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और विशाल चट्टानों के खिसकने के कारण अचानक प्रलयकारी बाढ़ आ गई थी। इस कुदरती आफत ने उत्तरी और मध्य नेपाल के कई संपन्न कस्बों और गांवों को देखते ही देखते मलबे के ढेर में बदल दिया। नेपाल के इतिहास की इस सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा ने जहां पूरे देश को शोक में डुबो दिया है, वहीं राहत और बचाव कर्मियों का संघर्ष अभी भी जारी है ताकि मलबे में दबी अंतिम जिंदगी को भी सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।
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