शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में जिला परिषद के शीर्ष पदों के लिए होने वाले चुनाव ने राज्य की सियासत में हलचल तेज कर दी है। जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चयन में हो रही देरी का मामला अब प्रदेश के उच्च न्यायालय की दहलीज पर है। हाई कोर्ट ने इस विवाद से जुड़ी एक महत्वपूर्ण याचिका पर अपनी विस्तृत सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस न्यायिक प्रक्रिया के बीच प्रदेश के दो प्रमुख राजनीतिक दल, भाजपा और कांग्रेस, परिषद की सत्ता पर काबिज होने के लिए अपनी-अपनी बिसात बिछाने में जुट गए हैं। दोनों ही दलों की नजरें अब अदालत के अंतिम आदेश पर टिकी हैं, जिसके बाद चुनाव की नई तारीख का एलान होते ही बहुमत का असली शक्ति परीक्षण शुरू होगा।
शिमला जिला परिषद का राजनीतिक गणित वर्तमान में काफी दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। परिषद के कुल ढांचे और बहुमत के आंकड़ों को समझने के लिए निम्नलिखित समीकरण महत्वपूर्ण हैं:
| जिला परिषद शिमला: चुनावी समीकरण | विवरण |
| कुल निर्वाचित सदस्य | 25 |
| बहुमत के लिए आवश्यक संख्या | 13 |
| भाजपा का वर्तमान दावा | 13 सदस्य |
| कांग्रेस का संभावित समर्थन | 11 सदस्य |
| जीत के लिए कांग्रेस को चाहिए | 02 अतिरिक्त सदस्य |
यह चुनावी विवाद मई 2026 में संपन्न हुए पंचायती राज चुनावों के बाद से ही लगातार गरमाया हुआ है। चुनाव परिणाम आने के कई महीनों बाद भी जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव संपन्न नहीं हो सका है, जिसके चलते स्थानीय जनप्रतिनिधियों में भारी असंतोष है। इसी गतिरोध के कारण मामला अदालत तक पहुंचा, जहां याचिकाकर्ता ने प्रशासन पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जानबूझकर बाधित करने और चुनाव टालने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कोर्ट को अवगत कराया कि आगामी विधानसभा सत्र की तैयारियों और उसमें जिला प्रशासन की व्यस्तता के कारण फिलहाल चुनाव कराना संभव नहीं था। सरकार की ओर से दलील दी गई कि जिलाधीश शिमला की व्यस्तता को ध्यान में रखते हुए जिला परिषद की अगली बैठक के लिए 10 सितंबर की तिथि निर्धारित की गई है। प्रशासन का कहना है कि विधानसभा सत्र के समापन के बाद पूरी पारदर्शिता के साथ चुनावी प्रक्रिया को संपन्न कराया जाएगा।
सियासी गलियारों में इस समय जोड़-तोड़ की राजनीति अपने चरम पर है। भाजपा जहां अपने 13 सदस्यों के कुनबे को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती से जूझ रही है, वहीं कांग्रेस उन निर्दलीय या असंतुष्ट सदस्यों को साधने की कोशिश में है जो अंतिम समय में बाजी पलट सकते हैं। यदि कांग्रेस भाजपा समर्थित किसी भी एक सदस्य को अपने पाले में खींचने में सफल रहती है, तो भाजपा का बहुमत का दावा धराशायी हो सकता है। दूसरी ओर, भाजपा का पूरा जोर अपने समर्थकों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ विपक्षी खेमे में सेंधमारी करने पर भी है।
अदालत का फैसला आने के बाद यदि 10 सितंबर को चुनाव होते हैं, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि शिमला जिला परिषद की बागडोर किसके हाथ आती है। यह चुनाव केवल एक जिले की परिषद का चुनाव नहीं है, बल्कि इसे आगामी राजनीतिक भविष्य के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। फिलहाल, शिमला जिला परिषद के गलियारों में सन्नाटा है, लेकिन पर्दे के पीछे दोनों दल अपने-अपने बहुमत को साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। सभी की निगाहें अब हाई कोर्ट के उस फैसले पर हैं जो शिमला की इस छोटी सरकार का भविष्य तय करेगा।