ढाका। बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा फेरबदल देखने को मिला है। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। न्यूज एजेंसी ने स्थानीय मीडिया के हवाले से इस खबर की पुष्टि की है। शहाबुद्दीन का यह इस्तीफा उनके पांच साल के कार्यकाल के समाप्त होने से लगभग दो साल पहले ही आ गया है। इस इस्तीफे को देश में चल रहे राजनीतिक गतिरोध और सत्ता परिवर्तन के बाद के घटनाक्रमों से जोड़कर देखा जा रहा है।
शेख हसीना से संबंध और इस्तीफे का दबाव
शहाबुद्दीन के इस्तीफे के पीछे सबसे बड़ी वजह पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना से उनकी नजदीकी बताई जा रही है। वर्तमान सरकार उनके पद पर बने रहने को लेकर सहज नहीं थी क्योंकि वह लंबे समय से हसीना के करीबी सहयोगी रहे हैं। हाल ही में शेख हसीना ने दिसंबर में बांग्लादेश लौटने और कानून के सामने सरेंडर करने का ऐलान किया था। खबरों के मुताबिक, इस घोषणा के बाद प्रशासन ने शहाबुद्दीन से पद छोड़ने के लिए कहा था। सरकार इस बात को लेकर भी नाराज थी कि शहाबुद्दीन ने हाल के दिनों में दोबारा हसीना से संपर्क साधने की कोशिश की थी।
अंतरिम राष्ट्रपति की जिम्मेदारी और संवैधानिक स्थिति
बांग्लादेश के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति का पद रिक्त होने की स्थिति में संसद के स्पीकर ही अंतरिम प्रमुख की भूमिका निभाते हैं। अब जब तक देश में नए राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो जाता, तब तक संसद के स्पीकर हाफिज उद्दीन अहमद अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर कामकाज संभालेंगे। शहाबुद्दीन पिछली अवामी लीग सरकार के आखिरी ऐसे संवैधानिक पदाधिकारी थे, जो 2024 के विद्रोह के बावजूद अपने पद पर बने हुए थे। वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि उनके इस्तीफे के पीछे की कड़ियां काफी जटिल हैं, जो हसीना की वापसी के बयानों से जुड़ी हुई हैं।
शहाबुद्दीन का राजनीतिक सफर और 2024 का विद्रोह
मोहम्मद शहाबुद्दीन को साल 2023 में निर्विरोध राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था। वह पेशे से पूर्व जज रहे हैं और 1971 के मुक्ति संग्राम में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही थी। वह अब प्रतिबंधित हो चुकी अवामी लीग के उम्मीदवार थे। शहाबुद्दीन ने कुछ समय पहले ही यह संकेत दिए थे कि वह आम चुनाव के बाद पद छोड़ने का विचार कर रहे हैं। उनका मानना था कि हसीना की सरकार जाने के बाद बने अंतरिम प्रशासन के दौरान उन्हें लगातार दरकिनार किया जा रहा था, जिससे वे संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में खुद को असहज महसूस कर रहे थे।
छात्र आंदोलन और शेख हसीना को मौत की सजा
बांग्लादेश में मौजूदा राजनीतिक उथल-पुथल की शुरुआत साल 2024 के छात्र विरोध प्रदर्शनों के बाद हुई थी। उस दौरान हुई हिंसक कार्रवाई के बाद हसीना की सरकार गिर गई और उन्हें देश छोड़ना पड़ा था। इस मामले में बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने शेख हसीना और पूर्व गृह मंत्री असदुज्जामान खान कमाल को मौत की सजा सुनाई है। ट्रिब्यूनल ने उन्हें प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों और दमन के लिए जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, हसीना ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। अब शहाबुद्दीन के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश में संवैधानिक संकट और गहराने की आशंका जताई जा रही है।
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