Punjab: ओटीटी से हटी फिल्म ‘सतलुज’ पंजाब के काले सच और फर्जी एनकाउंटर को लेकर छिड़ा विवाद

नई दिल्ली। मशहूर गायक और अभिनेता दिलजीत दोसांझ की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘सतलुज’ एक बार फिर विवादों के भंवर में फंस गई है। तीन साल तक सेंसर बोर्ड (सीबीएफसी) के साथ चली लंबी कानूनी लड़ाई और 127 कट्स के सुझाव के बाद, फिल्म को हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 (ZEE5) पर रिलीज किया गया था। लेकिन रिलीज के मात्र 48 घंटों के भीतर ही इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया है। फिल्म को लेकर मचे बवाल और इस पर लगे प्रतिबंधों ने मनोरंजन जगत के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज कर दी है।

क्या है फिल्म की कहानी?
‘सतलुज’, जिसका प्रारंभिक नाम ‘पंजाब 95’ था, सुप्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित एक बायोपिक है। फिल्म 80 और 90 के दशक के उस अशांत कालखंड को दर्शाती है, जब पंजाब उग्रवाद की आग में झुलस रहा था। जसवंत सिंह खालरा ने उस दौर में हजारों अज्ञात शवों के गैर-कानूनी तरीके से किए गए अंतिम संस्कार का पर्दाफाश किया था। उन्होंने ऐसे ठोस सबूत जुटाए थे, जिनसे पता चलता था कि पुलिस ने परिवारों को सूचना दिए बिना चुपचाप शवों को ठिकाने लगा दिया था। 1995 में खालरा का खुद अपहरण कर लिया गया और उनकी हत्या कर दी गई, जिसके लिए बाद में कई पुलिस अधिकारियों को सजा मिली।

सेंसर बोर्ड और ओटीटी का विवाद
राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय होने के कारण सीबीएफसी ने इस फिल्म को सर्टिफिकेट देने में काफी मुश्किलें पैदा की थीं। मेकर्स का आरोप था कि बोर्ड ने फिल्म में 127 कट लगाने और यहां तक कि खालरा का नाम तक बदलने की मांग की थी। अंततः फिल्म को बिना किसी कट के जी5 पर 3 जुलाई को रिलीज किया गया, लेकिन 5 जुलाई को इसे ‘मौजूदा हालातों’ का हवाला देते हुए हटा दिया गया। प्लेटफॉर्म का कहना है कि वे मेकर्स के साथ खड़े हैं, लेकिन फिलहाल इसे भारत में स्ट्रीम नहीं किया जा सकता।

फिल्म को विवादित बनाने वाले 5 मुख्य कारण

फिल्म के विरोध और इसे हटाए जाने के पीछे निम्नलिखित कारण बताए जा रहे हैं:

  1. प्रजातंत्र की विफलता: फिल्म दिखाती है कि कैसे सिस्टम ने 80-90 के दशक में पंजाब में लोकतंत्र को कुचलने का प्रयास किया।

  2. मानवाधिकारों का उल्लंघन: बिना पहचान और सूचना के हजारों शवों का अंतिम संस्कार करना मानवाधिकारों का बड़ा हनन था, जिसे फिल्म प्रमुखता से उठाती है।

  3. फर्जी एनकाउंटर: फिल्म में प्रशासन द्वारा किए गए 25 फर्जी एनकाउंटर के मुद्दों को दिखाया गया है, जो सीधे तौर पर तत्कालीन पुलिस प्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं।

  4. इतिहास का काला अध्याय: फिल्म पंजाब के उस दौर के दर्द को उजागर करती है, जहां लोगों के जीने के अधिकार को छीना गया था।

  5. राजनीतिक भ्रष्टाचार: यह फिल्म देश की राजनीति और शासन व्यवस्था में गहरे पैठ जमा चुके भ्रष्टाचार की पोल खोलती है।

अधूरा रह गया सफर
निर्देशक हनी त्रेहान की इस फिल्म में दिलजीत दोसांझ के साथ अर्जुन रामपाल और सुविंदर विक्की मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म को ओटीटी पर मिले जबरदस्त रिस्पॉन्स के बावजूद इसका हटाया जाना दर्शकों के लिए बड़ा झटका है। जी5 ने अपने बयान में कहा है कि वे उचित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाकर इस फिल्म को जल्द वापस लाने की कोशिश करेंगे। वहीं, फिल्म के अचानक हटने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवेदनशील ऐतिहासिक घटनाओं के चित्रण पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। फिलहाल ‘सतलुज’ का सफर अगली सूचना तक थम गया है।

 

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