नई दिल्ली। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का निधन हो गया है। उनके जाने से प्रदेश की राजनीति में एक ऐसे युग का अंत हो गया है, जिसकी पहचान केवल सत्ता से नहीं बल्कि सिद्धांतों, कठोर अनुशासन और बेदाग ईमानदारी से थी। सैन्य सेवा से लेकर देश और प्रदेश की राजनीति के शीर्ष पदों तक का उनका सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बना रहेगा।
भुवन चंद्र खंडूड़ी का जन्म 1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में हुआ था। राजनीति के मैदान में उतरने से पहले उन्होंने भारतीय सेना में एक लंबा और गौरवशाली समय बिताया। सेना की इंजीनियरिंग कोर में एक अधिकारी के रूप में उनकी कार्यकुशलता और समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें 1982 में ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ से सम्मानित किया गया था। मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपनी प्रशासनिक क्षमता और अनुशासन को जनसेवा में लगाने का निर्णय लिया और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया।
राजनीतिक सफर की शुरुआत 1991 में हुई, जब वे पहली बार गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद वे कई बार संसद पहुंचे और भाजपा के एक कद्दावर पहाड़ी नेता के रूप में अपनी पहचान स्थापित की। उनकी काबिलियत को देखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्हें सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। यह वही दौर था जब भारत में सड़क क्रांति की नींव रखी जा रही थी। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को धरातल पर उतारने और देश के दुर्गम गांवों को मुख्यधारा की सड़कों से जोड़ने में खंडूड़ी की दूरदृष्टि और कार्यशैली की आज भी सराहना की जाती है।
वर्ष 2007 में जब उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनी, तो नेतृत्व की कमान भुवन चंद्र खंडूड़ी को सौंपी गई। मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल ‘जीरो टॉलरेंस’ यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता के लिए जाना गया। उन्होंने प्रदेश की अफसरशाही पर इतनी कड़ाई से नियंत्रण रखा कि सरकारी तंत्र में अनुशासन का नया संचार हुआ। हालांकि, उनकी यही सख्ती कई बार उनके अपने राजनीतिक सहयोगियों और विधायकों के लिए असहजता का कारण भी बनी। 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद उन्होंने नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, जनता के बीच उनकी लोकप्रियता को देखते हुए पार्टी ने 2011 में एक बार फिर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया।
भुवन चंद्र खंडूड़ी की सबसे बड़ी पूंजी उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी थी। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां अक्सर राजनीतिक उथल-पुथल बनी रहती थी, खंडूड़ी की छवि हमेशा साफ-सुथरी रही। उनके राजनीतिक विरोधी भी कभी उनकी नीयत या ईमानदारी पर उंगली नहीं उठा सके। 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कोटद्वार सीट से हार झेलनी पड़ी, लेकिन इससे उनके कद या सम्मान में कोई कमी नहीं आई। 2014 में वे एक बार फिर गढ़वाल से सांसद चुने गए, लेकिन उम्र और गिरते स्वास्थ्य के कारण धीरे-धीरे उन्होंने सक्रिय राजनीति से किनारा कर लिया।
उनके निधन के साथ उत्तराखंड ने अपना एक ‘अनुशासन पुरुष’ खो दिया है। वे एक ऐसे जननेता थे जिन्होंने राजनीति को समझौतों का खेल नहीं, बल्कि सिद्धांतों की डगर माना। राज्य निर्माण के शुरुआती दशकों में उत्तराखंड को विकास और सुशासन की दिशा दिखाने में उनकी भूमिका सदैव स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी।