Himachal: हिमाचल में आर्थिक संकट गहराया कर्ज और घाटे के बोझ तले दबे सरकारी बोर्ड और निगम

शिमला। हिमाचल प्रदेश में सरकारी संस्थाओं की आर्थिक स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है। विधानसभा में विधायकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के लिखित उत्तर में सरकार ने स्वीकार किया है कि प्रदेश के कुल 22 में से 10 बोर्ड और निगम इस समय करोड़ों रुपये के घाटे का सामना कर रहे हैं। विशेष रूप से हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) और बिजली बोर्ड जैसे राज्य के बड़े उपक्रम इस वित्तीय संकट से उबरने में पूरी तरह विफल रहे हैं, जिससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है।

प्रकाश राणा, रणधीर शर्मा, राकेश जम्वाल, इंद्रदत्त लखनपाल और सुधीर शर्मा के सवालों का जवाब देते हुए सरकार ने सदन को बताया कि राज्य पर वर्तमान में 1,01,863 करोड़ रुपये का भारी-भरकम कर्ज है। इस कर्ज की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल ब्याज की अदायगी के लिए ही सरकार को इस वित्तीय वर्ष में 7,272 करोड़ रुपये की भारी राशि खर्च करनी होगी। राजस्व प्राप्तियों के आंकड़ों पर नजर डालें तो केंद्र से मिलने वाले अनुदान और केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी में बड़ी गिरावट देखी गई है। तीन साल पहले जो सहायता राशि 14,942 करोड़ रुपये थी, वह अब घटकर मात्र 9,190 करोड़ रुपये रह गई है। हालांकि, राज्य ने अपने आंतरिक संसाधनों से आय बढ़ाने का प्रयास किया है, लेकिन केंद्रीय अनुदान में हुई कमी ने स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

कर्ज के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पिछले तीन वर्षों के दौरान सरकार ने खुले बाजार, नाबार्ड और अन्य वित्तीय संस्थानों से कुल 35,555 करोड़ रुपये का नया ऋण लिया है। इसमें सबसे ताजा कर्ज 25 फरवरी 2026 को लिया गया, जहां 7.69 प्रतिशत की ब्याज दर पर 1030 करोड़ रुपये जुटाए गए। पिछले तीन सालों में सरकार ने कर्ज और ब्याज चुकाने पर ही 26,256 करोड़ रुपये खर्च कर दिए हैं। इस भारी खर्च के कारण राज्य के पास अन्य विकास कार्यों और कल्याणकारी योजनाओं के लिए सीमित धनराशि ही बच रही है।

इस गंभीर आर्थिक संकट से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने कई कड़े और सुधारात्मक कदम उठाए हैं। राजस्व में वृद्धि के लिए शराब पर ‘मिल्क सेस’ और ‘गौवंश उपकर’ लगाया गया है, जबकि बिजली की खपत पर ‘पर्यावरण सेस’ लागू किया गया है। सरकारी खर्चों में कटौती के लिए मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के वेतन का एक हिस्सा छह माह के लिए स्थगित कर दिया गया है। साथ ही, अधिकारियों की हवाई यात्राओं पर रोक और ईंधन व फोन खर्च की सीमा तय कर दी गई है। सरकार ने सभी बोर्ड और निगमों को आत्मनिर्भर बनने का कड़ा निर्देश दिया है ताकि वे सरकारी खजाने पर बोझ न बनें। इसके अलावा, सरप्लस स्टाफ पूल बनाकर कर्मचारियों की कार्यकुशलता बढ़ाने का प्रयास भी किया जा रहा है।

 

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