Uttarakhand: उत्तराखंड की लोकगाथा पर बनी फिल्म ‘लकुड़िया वीर’ का दादासाहब फाल्के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए चयन – The Hill News

Uttarakhand: उत्तराखंड की लोकगाथा पर बनी फिल्म ‘लकुड़िया वीर’ का दादासाहब फाल्के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए चयन

देहरादून। उत्तराखंड की देवतुल्य हिमालयी वादियों से निकली एक स्वतंत्र फिल्म ‘लकुड़िया वीर’ ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय जोड़ दिया है। इस फिल्म को प्रतिष्ठित ‘दादासाहब फाल्के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ (DPIFF) 2026 के लिए आधिकारिक रूप से चुना गया है। यह उपलब्धि न केवल फिल्म की टीम के लिए, बल्कि पूरे उत्तराखंड के सांस्कृतिक और सिनेमाई जगत के लिए एक गौरवशाली क्षण है। इस चयन ने यह साबित कर दिया है कि उत्तराखंड की माटी से उपजी कहानियां वैश्विक स्तर पर अपनी सशक्त पहचान बनाने में सक्षम हैं।

‘लकुड़िया वीर’ उत्तराखंड की एक सच्ची और सदियों पुरानी लोकगाथा पर आधारित है। यह वही महान कहानी है जो पीढ़ियों से पहाड़ों में ढोल की गूंज और बुजुर्गों की जुबानी सुनाई जाती रही है। पहली बार इस लोककथा को आधुनिक सिनेमा के माध्यम से दुनिया के सामने लाया गया है। उत्तराखंड की संस्कृति में ढोल केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि देवताओं के आह्वान और अटूट लोक-आस्था का प्रतीक है। फिल्म में हिमालय के विशाल पहाड़ों को केवल एक दृश्य के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत पात्र के रूप में दिखाया गया है, जो पूरी कहानी के साथ निरंतर प्रवाहित होता नजर आता है।

इस सिनेमाई यात्रा की शुरुआत 14 नवंबर को उत्तरकाशी से हुई थी, जहाँ इसका पहला आधिकारिक प्रदर्शन किया गया। चूंकि फिल्म की प्रेरणा इसी भूमि से मिली है, इसलिए स्थानीय दर्शकों के लिए अपनी परंपरा और जीवन को पर्दे पर देखना एक बेहद भावुक अनुभव रहा। अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में निरंतर सराहना और पुरस्कार प्राप्त करने के बाद, अब ‘लकुड़िया वीर’ के निर्माता इसे पूरे भारत में रिलीज करने की तैयारी कर रहे हैं ताकि यह प्रेरणादायी कहानी देश के हर कोने तक पहुँच सके।

स्वतंत्र सिनेमा की ताकत को प्रदर्शित करते हुए इस फिल्म का निर्माण ‘शून्य कथा स्टूडियोज़’ के बैनर तले पूरी तरह निजी प्रयासों से किया गया है। फिल्म का निर्देशन और लेखन नवदीप सिंह पंवार ने किया है, जिनका मुख्य उद्देश्य हिमालय की लुप्त होती लोकसंस्कृति को नई पहचान दिलाना है। निर्माता शुभदर्शिनी सिंह ने सीमित संसाधनों के बावजूद इस बड़ी परियोजना को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्म की दृश्य भव्यता का श्रेय डीओपी शुभम थापा को जाता है, जबकि शिवोम सिंह के कुशल संपादन ने कहानी की लय और भावनात्मक गहराई को और प्रभावी बना दिया है।

वर्तमान में ‘लकुड़िया वीर’ विश्व के कई प्रमुख फिल्म महोत्सवों में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व कर रही है। DPIFF 2026 में इसका चयन इस बात की पुष्टि करता है कि क्षेत्रीय कहानियाँ अपनी मौलिकता के साथ वैश्विक दर्शकों के दिलों को छूने की ताकत रखती हैं। यह फिल्म उन पहाड़ों की सच्ची पुकार है जहाँ आज भी ढोल की थाप पर देवताओं का आह्वान किया जाता है। ‘लकुड़िया वीर’ केवल एक चलचित्र नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जीवंत आत्मा और गौरवशाली परंपराओं का एक दस्तावेज है, जो अब विश्व पटल पर चमकने के लिए तैयार है।

 

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