शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मंगलवार को सदन में उस समय एक रोचक और तल्ख स्थिति पैदा हो गई, जब भ्रष्टाचार और सरकारी अनियमितताओं से जुड़े एक सवाल पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए। भाजपा विधायक बिक्रम सिंह ठाकुर ने सहकारी सभाओं के पंजीकरण और उनमें हुई कथित धांधलियों की जांच को लेकर एक विस्तृत प्रश्न पूछा था। इस प्रश्न के उत्तर में उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने जो दलील दी, उसने सदन का माहौल गर्मा दिया। डिप्टी सीएम ने विधायक से इस सवाल को वापस (विड्रो) लेने का अनुरोध करते हुए कहा कि इसका जवाब तैयार करना सरकारी खजाने पर भारी पड़ेगा।
मुकेश अग्निहोत्री ने तर्क दिया कि प्रदेश की सहकारी सभाओं में अनियमितताओं का दायरा इतना बड़ा है कि इनका पूरा विवरण और जांच रिपोर्ट तैयार करने में लाखों रुपये का खर्च आएगा। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि यदि पूरा विवरण दिया गया तो कागजों का भंडार लग जाएगा। उन्होंने बिक्रम सिंह ठाकुर से आग्रह किया कि वे जनहित में इस सवाल को छोड़ दें और यदि उन्हें किसी विशिष्ट मामले की जानकारी चाहिए, तो वे उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध करा देंगे। हालांकि, भाजपा विधायक ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। बिक्रम सिंह ठाकुर ने कड़े तेवर दिखाते हुए कहा कि सवाल किसी भी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार जवाब देने के लिए जितना चाहे समय ले सकती है, चाहे तो अगले सत्र में जवाब दे, लेकिन तथ्यों को सदन के पटल पर रखना ही होगा।
डिप्टी सीएम ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि सरकार की मंशा किसी भी तथ्य को छिपाने की नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जवाब इतना विस्तृत और पेचीदा है कि इसमें समय और संसाधन अधिक लग रहे हैं, इसीलिए उन्होंने केवल एक सुझाव दिया था।
सदन में एक अन्य महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्रदेश के बुनियादी ढांचे को लेकर एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया। विधायक सतपाल सिंह सत्ती के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में लगभग 600 सरकारी भवन पूरी तरह खाली और अनुपयोगी पड़े हैं। मुख्यमंत्री ने आशंका जताई कि यह संख्या वास्तव में और भी अधिक हो सकती है। उन्होंने सदन को भरोसा दिलाया कि सरकार इस सत्र के दौरान ही सभी जिलों से विस्तृत जानकारी जुटाकर सदन में रखेगी।
इस मुद्दे पर सतपाल सिंह सत्ती ने सरकार को घेरते हुए कहा कि यह स्थिति अत्यंत विरोधाभासी है। उन्होंने बताया कि एक ओर सरकार के करोड़ों रुपये की लागत से बने भवन धूल फांक रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई सरकारी कार्यालय निजी इमारतों में चल रहे हैं, जिनके लिए सरकार हर महीने लाखों रुपये का किराया चुका रही है। उन्होंने मांग की कि जिला मुख्यालयों से जल्द रिकॉर्ड मंगाकर इन भवनों का सदुपयोग सुनिश्चित किया जाए। विधानसभा में इन दोनों ही मुद्दों ने सरकार की कार्यप्रणाली और वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर बहस छेड़ दी है।