नैनीताल।
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य परिवहन निगम के उन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को एक बड़ी राहत प्रदान की है, जिनसे विभाग द्वारा रिटायरमेंट के बाद मिले लाभों की वसूली की जा रही थी। न्यायालय ने निगम की इस कार्रवाई को अनुचित मानते हुए वसूली के आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। शुक्रवार को हुई इस अहम सुनवाई में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमानुसार कर्मचारियों को प्रदान किए जा चुके आर्थिक लाभों को वापस लेना न्यायसंगत नहीं है।
यह मामला न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की अवकाश कालीन पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ था। रोडवेज से सेवानिवृत्त हुए जगदीश प्रसाद पंत, राम सिंह और सुरेश मासीवाल ने इस संबंध में याचिका दायर कर विभाग के फैसले को चुनौती दी थी। इन पूर्व कर्मचारियों का कहना था कि उन्होंने उत्तराखंड परिवहन निगम में दशकों तक पूरी निष्ठा और संतोषजनक तरीके से अपनी सेवाएं दी हैं। उनकी सेवा अवधि के दौरान कोई शिकायत नहीं थी और सेवानिवृत्ति के समय उन्हें विभाग द्वारा तय किए गए विभिन्न वित्तीय लाभ और भत्ते प्रदान किए गए थे।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, रिटायरमेंट के बाद एक लंबी अवधि बीत जाने पर निगम ने अचानक उनके लाभों में कटौती और वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी। विभाग की इस कार्रवाई से पूर्व कर्मचारियों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। याचिका में दलील दी गई कि विभाग का यह कदम न केवल विभागीय नियमावली के खिलाफ है, बल्कि यह हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए विभिन्न लैंडमार्क फैसलों का भी खुला उल्लंघन है। दलील में कहा गया कि एक बार दिए गए लाभों को दोबारा कर्मचारियों से वसूलना मौलिक अधिकारों के विपरीत है।
अदालत ने मामले की गहनता और दलीलों को सुनने के बाद यह माना कि कर्मचारियों को दिए जा चुके लाभों की वसूली करना विधि के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। विशेषकर तब, जब कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हों और उन पर कोई धोखाधड़ी या गलत जानकारी देने का आरोप न हो। पूर्व में भी उच्चतम न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि ग्रुप ‘सी’ और ‘डी’ के कर्मचारियों या सेवानिवृत्त कर्मियों से इस तरह की रिकवरी करना अनुचित है।
न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए रिकवरी आदेश पर रोक लगा दी और इन याचिकाओं को निस्तारित कर दिया। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद अब परिवहन निगम के उन हजारों अन्य सेवानिवृत्त कर्मचारियों में भी उम्मीद जगी है, जो इसी तरह की रिकवरी प्रक्रिया का सामना कर रहे थे। न्यायालय के इस हस्तक्षेप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी विभाग अपने कर्मचारियों के साथ मनमाना व्यवहार नहीं कर सकते, विशेषकर उन मामलों में जो उनके सेवानिवृत्ति के बाद की गरिमापूर्ण आजीविका से जुड़े हों। अब निगम को हाई कोर्ट के इस आदेश का पालन करना होगा और वसूली गई राशि के संबंध में स्थिति स्पष्ट करनी होगी।