Himachal: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा आदेश 30 अप्रैल तक संपन्न होंगे पंचायती राज चुनाव – The Hill News

Himachal: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा आदेश 30 अप्रैल तक संपन्न होंगे पंचायती राज चुनाव

शिमला। हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज चुनावों को लेकर चल रही अनिश्चितता पर हाई कोर्ट ने विराम लगा दिया है। प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार और चुनाव आयोग को आदेश दिया है कि 30 अप्रैल से पहले पंचायतों के चुनाव हर हाल में संपन्न करवाए जाएं। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में देरी के लिए प्रशासनिक कारणों को आधार नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने अपने आदेश में सख्त समयसीमा निर्धारित की है। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि चुनाव से संबंधित तमाम प्रारंभिक और आधिकारिक प्रक्रियाएं 28 फरवरी तक अनिवार्य रूप से पूरी कर ली जाएं। इसके पश्चात अप्रैल माह के अंत तक मतदान और परिणाम की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए। इस फैसले के बाद प्रदेश में चुनावी सरगर्मी तेज होने की संभावना है, क्योंकि अब प्रशासन के पास तैयारियों के लिए बेहद सीमित समय बचा है।

इस मामले में याचिकाकर्ता डिक्कन कुमार ठाकुर और उनके अधिवक्ता नंदलाल ठाकुर ने अदालत के रुख को बड़ी राहत बताया है। उन्होंने दलील दी थी कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद समय पर चुनाव कराना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि सरकार आपदा अधिनियम (डिजास्टर एक्ट) का हवाला देकर या अन्य प्रशासनिक गतिविधियों की आड़ में पंचायती राज चुनावों को नहीं टाल सकती।

दूसरी ओर, सुक्खू सरकार ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए चुनाव टालने के पीछे की मजबूरियां गिनाई थीं। सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि उनकी मंशा चुनावों को बाधित करने की नहीं है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों और राज्य में चल रहे विभिन्न प्रशासनिक कार्यों के कारण कम से कम छह महीने का अतिरिक्त समय आवश्यक है। सरकार ने मुख्य रूप से नई पंचायतों, पंचायत समितियों और नगर निगमों के परिसीमा निर्धारण (डिलिमिटेशन) की प्रक्रिया को देरी का कारण बताया था। सरकार का कहना था कि सीमांकन की प्रक्रिया जारी रहने के कारण मतदाता सूचियों और चुनाव क्षेत्रों के निर्धारण में व्यावहारिक कठिनाइयां आ रही हैं।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने सरकार की इन दलीलों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया था। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों के अनुसार, परिसीमन या जनगणना जैसी गतिविधियों के नाम पर संवैधानिक रूप से अनिवार्य चुनावों को टाला नहीं जा सकता। याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि नई पंचायतों और जिला परिषदों की परिसीमा निर्धारण की प्रक्रिया को चुनाव संपन्न होने के बाद भी जारी रखा जा सकता है, लेकिन इसके कारण जनता को उनके लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रखना अनुचित है।

अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद यह माना कि समय पर चुनाव करवाना सरकार का एक अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है। हाई कोर्ट के इस आदेश ने यह साफ कर दिया है कि प्रशासनिक कार्यों के आधार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं के गठन में विलंब स्वीकार्य नहीं है। अब राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार को फरवरी के अंत तक अपनी मशीनरी को सक्रिय कर चुनाव के लिए तैयार करना होगा, ताकि अप्रैल के भीतर पूरी प्रक्रिया को सुचारू रूप से संपन्न किया जा सके। इस फैसले ने उन हजारों उम्मीदवारों और ग्रामीण मतदाताओं में उम्मीद जगाई है जो लंबे समय से पंचायत चुनावों का इंतजार कर रहे थे।

 

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