नई दिल्ली. प्रख्यात फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा है और उनकी पहली पेशकश ‘गुस्ताख इश्क’ अब दर्शकों के सामने है। ‘हवाईजादा’ और ‘ताज: डिवाइडेड बाय ब्लड’ के बाद निर्देशक विभु पुरी ने इस फिल्म का लेखन और निर्देशन संभाला है। यह फिल्म एक ऐसी प्रेम कहानी है जो दिल्ली की पुरानी गलियों से शुरू होकर पंजाब की हरियाली और सर्दी के अहसास के बीच परवान चढ़ती है। फिल्म की रफ्तार भले ही धीमी है, लेकिन इसमें ठहराव और सुकून है जो आज की भागदौड़ भरी कहानियों से अलग है।
फिल्म की कहानी 1998 में दिल्ली के दरियागंज से शुरू होती है। मुख्य किरदार नवाबुद्दीन सैफुद्दीन रहमान उर्फ पप्पन (विजय वर्मा) तंगहाली में जी रहा है। वह अपने मरहूम पिता की आखिरी निशानी एक प्रिंटिंग प्रेस को कर्ज और बंद होने से बचाना चाहता है। हालात ऐसे हैं कि वह बवासीर और मर्दानगी के नुस्खे जैसे पोस्टर छापकर गुजारा कर रहा है। इसी बीच उसे शायर अजीज (नसीरुद्दीन शाह) के बारे में पता चलता है और वह उनकी किताब छापने के इरादे से पंजाब के मलेरकोटला पहुंच जाता है। वहां उसकी मुलाकात अजीज की बेटी मिन्नी (फातिमा सना शेख) से होती है। पप्पन, अजीज का शागिर्द बनकर शायरी सीखने लगता है और धीरे-धीरे मिन्नी को अपना दिल दे बैठता है। मिन्नी, जो स्कूल में शिक्षिका है, उसका अपना एक अतीत है। कहानी में मोड़ तब आता है जब पप्पन को अजीज और अपने पिता के पुराने संबंधों का पता चलता है और उसे इश्क के असली मायने समझ आते हैं।
फिल्म का स्क्रीनप्ले और संवाद विभु पुरी ने प्रशांत झा के साथ मिलकर लिखे हैं। शुरुआत में कहानी काफी धीमी गति से आगे बढ़ती है। उर्दू शायरी, तहजीब और नफासत के साथ मिन्नी और पप्पन की प्रेम कहानी को स्थापित करने में निर्देशक ने पूरा समय लिया है। वे किसी जल्दबाजी में नहीं दिखते और दर्शकों को पुराने दौर की यादों में ले जाते हैं जब प्यार का इजहार छुप-छुपकर देखने में होता था। मध्यांतर के बाद कहानी थोड़ी गति पकड़ती है। पप्पन का स्वार्थ, उसका गुस्सा और बाद में पश्चाताप, साथ ही अजीज का दर्द बखूबी उभर कर आता है। हालांकि, फिल्म 1998 में सेट बताई गई है लेकिन इसे देखते हुए लगता है कि हम पिछली सदी के सातवें या आठवें दशक की कहानी देख रहे हैं।
अभिनय के मामले में फिल्म मजबूत है। विजय वर्मा, जो अब तक अपनी संजीदा और डार्क भूमिकाओं के लिए जाने जाते थे, पहली बार रोमांटिक अवतार में नजर आए हैं। उन्होंने पप्पन के स्वार्थी और प्रेमी दोनों रूपों को बखूबी जिया है, हालांकि उर्दू उच्चारण में वे कहीं-कहीं कमजोर पड़े हैं। फातिमा सना शेख बेहद खूबसूरत दिखी हैं और उन्होंने मिन्नी के दर्द और अहसासों को संजीदगी से पेश किया है। नसीरुद्दीन शाह फिल्म की जान हैं। शायर और पिता के रूप में उनकी अदायगी बेमिसाल है। शारिब हाशमी ने भी अपनी छोटी सी भूमिका में प्रभाव छोड़ा है।
फिल्म का एक और मजबूत पक्ष गुलजार के गीत और विशाल भारद्वाज का संगीत है, जो कहानी के साथ न्याय करते हैं। कुल मिलाकर ‘गुस्ताख इश्क’ कोई मसाला फिल्म नहीं है, बल्कि यह उन दर्शकों के लिए है जो इश्क की गुस्ताखियों को महसूस करना चाहते हैं और उर्दू शायरी की नफासत के शौकीन हैं।
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