नई दिल्ली। देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों के बीच विपक्षी आइएनडीआइए गठबंधन की एक महत्वपूर्ण बैठक सोमवार को राजधानी दिल्ली में होने जा रही है। यह बैठक ऐसे समय में बुलाई गई है जब विपक्षी खेमे के कई प्रमुख दलों के भीतर आंतरिक कलह और आपसी मतभेद चरम पर हैं। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य नीट पेपर लीक मामले, सीबीएसई ओएसएम की खामियों और पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर केंद्र की मोदी सरकार को घेरना है। हालांकि, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती गठबंधन को बिखरने से बचाने और सभी क्षेत्रीय दलों को एक साझा राजनीतिक पटरी पर बनाए रखने की है।
हालिया चुनाव नतीजों ने गठबंधन के भीतर समीकरणों को काफी हद तक प्रभावित किया है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की अप्रत्याशित हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में भारी राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है। पार्टी के भीतर मचे इस बिखराव को थामने के लिए ममता बनर्जी अब विपक्षी एकजुटता का सहारा लेना चाहती हैं। यही कारण है कि उन्होंने ही सबसे पहले इस बैठक को बुलाने की वकालत की थी। टीएमसी के राज्यसभा नेता डेरेक ओब्रायन ने इस बैठक में शामिल होने की पुष्टि करते हुए कहा कि साझा मकसद और स्पष्ट इरादे के साथ गठबंधन एकजुट है।
दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए अन्य क्षेत्रीय सहयोगियों को साधना आसान नहीं दिख रहा है। तमिलनाडु में बदले हुए हालात के बाद द्रमुक (डीएमके) ने इस बैठक से किनारा करने का फैसला किया है। दरअसल, तमिलनाडु में स्टालिन की हार के बाद कांग्रेस ने टीवीके नेता विजय को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन देकर द्रमुक के साथ अपना दो दशक पुराना गठबंधन तोड़ दिया है, जिससे स्टालिन बेहद नाराज हैं। इसी तरह केरल में भी वामपंथी दल कांग्रेस से खफा नजर आ रहे हैं। वामपंथी नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव के दौरान उन पर भाजपा के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया था। माकपा नेता एमए बेबी इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से पहले ही स्पष्टीकरण मांग चुके हैं।
इन तमाम चुनौतियों के बावजूद कांग्रेस ने विपक्षी दलों के बीच एकजुटता का दावा किया है। कांग्रेस के संचार महासचिव जयराम रमेश ने जानकारी दी कि सोमवार दोपहर 12 बजे नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में होने वाली इस बैठक में 23 पार्टियां हिस्सा लेंगी। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ दल अपने निजी कारणों से शामिल नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन वे मोदी सरकार की उन नीतियों के विरोध में गठबंधन के साथ हैं जो आम जनता के संवैधानिक अधिकारों का हनन कर रही हैं। जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार जांच एजेंसियों के जरिए विपक्ष को निशाना बना रही है और महंगाई व बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर युवाओं और आम नागरिकों के साथ विश्वासघात कर रही है।
विपक्षी गठबंधन की यह बैठक 2029 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भविष्य की रणनीति तैयार करने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जहां एक ओर ममता बनर्जी को अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए कांग्रेस की आवश्यकता है, वहीं कांग्रेस के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथियों और द्रमुक जैसे दलों का साथ जरूरी है। अब देखना यह होगा कि आपसी कड़वाहट और क्षेत्रीय विवादों को भुलाकर विपक्षी दल किस हद तक सरकार के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने में सफल हो पाते हैं।
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