देहरादून। पहाड़ों की शांत वादियों, प्रकृति की खूबसूरती और बचपन की मासूमियत को अपनी लेखनी से जीवंत करने वाले प्रख्यात लेखक रस्किन बांड मंगलवार को अपना 92वां जन्मदिन मनाएंगे। भारतीय अंग्रेजी साहित्य में रस्किन बांड एक ऐसा नाम है, जिन्होंने अपनी सरल और आत्मीय भाषा के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को वैश्विक पाठकों तक पहुंचाया है। हालांकि, इस वर्ष जन्मदिन के मौके पर उनका स्वास्थ्य थोड़ा नासाज है, जिसके चलते वह देहरादून के डालनवाला में अपने करीबी मित्र राहुल जैन के आवास पर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं।
रस्किन बांड का जन्म 19 मई 1934 को हिमाचल प्रदेश के कसौली में हुआ था। उनका बचपन जामनगर, देहरादून और शिमला जैसे शहरों की विविध संस्कृतियों के बीच बीता। उनके पिता ब्रिटिश वायुसेना में कार्यरत थे, लेकिन उनके असामयिक निधन ने रस्किन बांड के जीवन में एक गहरा अकेलापन भर दिया। इसी अकेलेपन और पहाड़ों की निस्तब्धता ने उनके भीतर के लेखक को झकझोरा। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शिमला के प्रतिष्ठित बिशप कॉटन स्कूल से प्राप्त की, लेकिन उनकी रचनाओं की असली आत्मा देहरादून और मसूरी की वादियों में रची-बसी रही।
पिछले कई दशकों से मसूरी के लंढौर क्षेत्र में रह रहे रस्किन बांड की कहानियों में दून घाटी की बारिश, पुरानी गलियां, रेलवे स्टेशन और वहां के जंगलों का जीवंत चित्रण मिलता है। उनकी दिनचर्या आज भी बेहद सादगीपूर्ण है, जिसमें किताबें, चाय और प्रकृति के साथ बिताए गए पल सबसे महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने लंढौर की एक छोटी सी खिड़की से पूरी दुनिया को पहाड़ों की सुंदरता और वहां के लोगों के संघर्ष व प्रेम की कहानियां सुनाईं।
रस्किन बांड को विशेष रूप से बच्चों और युवाओं का सबसे प्रिय लेखक माना जाता है। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनमें किसी प्रकार का कृत्रिम डर नहीं, बल्कि एक गहरा अपनापन महसूस होता है। उनकी सरल भाषा शैली के कारण ही कई पीढ़ियां उनकी किताबें पढ़ते हुए बड़ी हुई हैं। रस्किन बांड की कई कालजयी रचनाओं पर फिल्में और टेलीविजन धारावाहिक भी बन चुके हैं। ‘द ब्लू अम्ब्रेला’ और ‘7 खून माफ’ जैसी चर्चित फिल्मों के माध्यम से उनकी कहानियां सिनेमाई पर्दे तक पहुंचीं और व्यापक स्तर पर सराही गईं।
साहित्यिक यात्रा की बात करें तो रस्किन बांड ने मात्र 17 वर्ष की अल्पायु में अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘द रूम ऑन द रूफ’ लिख दिया था। इस रचना के लिए उन्हें 1957 में प्रतिष्ठित ‘जॉन ल्यूवेलिन रीस’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह उपन्यास आज भी देहरादून और उसके आसपास के परिवेश का सबसे सटीक चित्रण माना जाता है। इसके बाद उन्होंने ‘टाइम स्टॉप्स एट शमली’, ‘आवर ट्रीज स्टिल ग्रो इन देहरा’, ‘द ब्लू अम्ब्रेला’ और ‘ए फ्लाइट ऑफ पिजन्स’ जैसी 100 से अधिक कहानियों, उपन्यासों और कविताओं का सृजन किया।
भारतीय साहित्य में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा जा चुका है। रस्किन बांड के पुत्र राकेश बांड ने बताया कि मंगलवार को वह 92 वर्ष के हो जाएंगे। पिछले दिनों कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उन्हें उपचार की आवश्यकता पड़ी थी, लेकिन अब उनके स्वास्थ्य में निरंतर सुधार हो रहा है और वह देहरादून में अपने मित्र के आवास पर आराम कर रहे हैं। रस्किन बांड आज केवल एक लेखक नहीं, बल्कि हिमालय की संवेदनाओं के जीवित हस्ताक्षर हैं।
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