नैनीताल।
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने लोक निर्माण विभाग और सिंचाई विभाग के नियमित वर्कचार्ज कर्मचारियों को पेंशन के दायरे से बाहर करने वाले वित्त विभाग के आदेश पर रोक लगा दी है। न्यायालय ने इस विवादास्पद मामले में राज्य सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले से प्रदेश के करीब दस हजार वर्तमान और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है। न्यायाधीश सुभाष उपाध्याय की एकलपीठ ने यह आदेश राम सिंह सैनी और अन्य कर्मचारियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
मामले के अनुसार, उत्तराखंड के वित्त विभाग ने 16 जनवरी को एक कार्यालय आदेश जारी किया था। इस आदेश में प्रावधान किया गया था कि पहली अक्टूबर 2005 के बाद नियमित हुए वर्कचार्ज कर्मचारियों को पेंशन के दायरे में शामिल नहीं किया जाएगा। सरकार के इस कदम से उन कर्मचारियों की पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ तत्काल प्रभाव से बंद कर दिए गए थे, जो वर्ष 2021-22 में सेवानिवृत्त हुए थे और जिन्हें अब तक पेंशन का लाभ मिल रहा था। इसके अलावा, विभाग ने सेवारत कर्मचारियों को पुरानी पेंशन के बजाय राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) से जोड़ने का निर्देश भी जारी किया था।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि वे 1980 से लेकर 2025 तक की लंबी अवधि में विभिन्न परियोजनाओं और विभागों में कार्यरत रहे हैं। सेवानिवृत्त कर्मियों और उनके मृतक आश्रितों को नियमित रूप से पेंशन और अन्य देयकों का भुगतान किया जा रहा था, लेकिन सरकार ने अचानक इस पर रोक लगा दी। याचिका में इस सरकारी आदेश को मनमाना और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व में दिए गए दिशा-निर्देशों का उल्लंघन बताया गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वर्ष 2018 के एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत का हवाला दिया गया। प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया था कि नियमित किए गए कर्मचारियों की वर्कचार्ज सेवा अवधि को भी उनकी कुल सेवा में जोड़ा जाना चाहिए। इस आधार पर वे कर्मचारी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के हकदार माने गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब देश की सर्वोच्च अदालत ने इस संबंध में स्पष्ट नियम तय कर दिए हैं, तो राज्य शासन द्वारा इसे दरकिनार कर पेंशन रोकना पूरी तरह अनुचित है।
हाई कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए वित्त विभाग के उस आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है जिसने हजारों परिवारों के आर्थिक हितों को प्रभावित किया था। अदालत ने सरकार से पूछा है कि किन परिस्थितियों में और किस आधार पर इन कर्मचारियों की पेंशन रोकने का निर्णय लिया गया।
इस अदालती हस्तक्षेप के बाद अब उन दस हजार कर्मचारियों की उम्मीदें फिर से जाग गई हैं, जिनकी आजीविका का मुख्य आधार पेंशन ही है। याचिका में यह भी रेखांकित किया गया कि एक तरफ सरकार कल्याणकारी राज्य होने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर दशकों तक अपनी सेवाएं देने वाले कर्मचारियों को उनके बुढ़ापे के सहारे से वंचित करने की कोशिश कर रही है। अब इस मामले में राज्य सरकार के जवाब के बाद ही अगली विधिक कार्रवाई तय होगी, लेकिन फिलहाल हाई कोर्ट के इस स्थगन आदेश ने कर्मचारियों को बड़ी तात्कालिक राहत प्रदान की है।
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