शिमला। हिमाचल प्रदेश में राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को बंद किए जाने से उत्पन्न गंभीर वित्तीय स्थिति पर विचार-विमर्श करने के लिए राज्य सचिवालय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और लंबी मंत्रिमंडलीय बैठक आयोजित की गई। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में प्रदेश की आर्थिक सेहत और भविष्य की चुनौतियों पर करीब दो घंटे तक गहन मंथन हुआ। मंत्रिमंडल ने एक स्वर में यह निर्णय लिया है कि प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए आगामी विधानसभा सत्र के दौरान एक औपचारिक संकल्प पेश किया जाएगा। इस संकल्प के माध्यम से राज्य सरकार केंद्र सरकार को यह स्पष्ट संदेश देगी कि राजस्व घाटा अनुदान को रोकना हिमाचल जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए कितना आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। सरकार का मुख्य उद्देश्य केंद्र को उन गंभीर और दूरगामी प्रभावों से अवगत करवाना है, जो इस अनुदान के बंद होने से राज्य की विकास दर और दैनिक प्रशासनिक खर्चों पर पड़ने वाले हैं।
बैठक के दौरान राज्य की डगमगाती वित्तीय स्थिति का एक विस्तृत खाका वित्त विभाग द्वारा प्रस्तुत किया गया। प्रधान सचिव वित्त देवेश कुमार ने मंत्रिमंडल के समक्ष एक उच्चस्तरीय प्रस्तुति दी, जिसमें आंकड़ों के माध्यम से यह समझाया गया कि राजस्व घाटा अनुदान हिमाचल प्रदेश के लिए केवल एक वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिकी का एक अनिवार्य आधार स्तंभ रहा है। मंत्रियों को अवगत करवाया गया कि यदि यह अनुदान बंद होता है, तो राज्य सरकार के लिए कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और चल रही विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए धन जुटाना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। इस प्रस्तुति ने मंत्रिमंडल को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आने वाले समय में राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए किन कठोर निर्णयों की आवश्यकता पड़ सकती है और केंद्र से अपने हक की लड़ाई को किस तरह तेज करना है।
मंत्रिमंडल की इस बैठक में केवल विरोध की रणनीति ही नहीं बनी, बल्कि आगामी विधायी कार्यों की रूपरेखा भी तैयार की गई। बैठक में राज्यपाल के अभिभाषण में शामिल किए जाने वाले प्रमुख बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि राज्यपाल के अभिभाषण को इस तरह तैयार किया जाए कि उसमें राज्य की वर्तमान वित्तीय विवशताओं और केंद्र के निर्णयों से होने वाले नुकसान का स्पष्ट उल्लेख हो। वित्त विभाग और योजना विभाग के अधिकारियों को ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस ड्राफ्ट को 11 फरवरी को होने वाली मंत्रिमंडल की अगली बैठक में अंतिम स्वीकृति के लिए पेश किया जाएगा। राज्यपाल का यह अभिभाषण न केवल सरकार की पिछले वर्षों की उपलब्धियों का लेखा-जोखा होगा, बल्कि यह भविष्य में राज्य पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ के खिलाफ एक मजबूत दस्तावेज के रूप में भी प्रस्तुत किया जाएगा।
हिमाचल प्रदेश सरकार का मानना है कि राजस्व घाटा अनुदान बंद करना किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं है, विशेषकर तब जब राज्य अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बावजूद विकास की राह पर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। मंत्रिमंडल ने यह भी तय किया कि इस मुद्दे को केवल सदन के भीतर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पुरजोर तरीके से उठाया जाएगा। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने संकेत दिए कि राज्य के विकास की गति को थामने वाले किसी भी फैसले का कड़ा विरोध किया जाएगा।
मंत्रिमंडल की बैठक समाप्त होने के तुरंत बाद सत्ता पक्ष को एकजुट करने और उन्हें जमीनी हकीकत से रूबरू करवाने के लिए एक और महत्वपूर्ण सत्र का आयोजन किया गया। इसमें कांग्रेस के सभी विधायकों को आमंत्रित किया गया था। वित्त विभाग की ओर से दी गई यह प्रस्तुति करीब डेढ़ घंटे तक चली, जिसमें विधायकों को राजस्व घाटा अनुदान बंद होने के बाद पैदा होने वाले ‘गंभीर हालातों’ के बारे में विस्तार से समझाया गया। इस सत्र के दौरान समूचा मंत्रिमंडल और विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया भी मौजूद रहे। विधायकों को बताया गया कि आने वाले समय में उनके निर्वाचन क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए बजट आवंटन में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है और इसके लिए वे जनता को किस प्रकार जागरूक करें।
विधायकों को दी गई इस ब्रीफिंग का मुख्य उद्देश्य विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष के हमलों का सामना करने और राज्य के पक्ष को मजबूती से रखने के लिए तैयार करना था। सरकार चाहती है कि हर विधायक इस मुद्दे की तकनीकी और आर्थिक बारीकियों को समझे ताकि वे सदन में चर्चा के दौरान तथ्यों के साथ अपनी बात रख सकें। कुलदीप सिंह पठानिया की मौजूदगी यह दर्शाती है कि सदन के भीतर इस विषय पर होने वाली चर्चा को सरकार कितनी गंभीरता से ले रही है।
आगामी 11 फरवरी की कैबिनेट बैठक अब और भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि उसी दिन राज्यपाल के अभिभाषण पर अंतिम मुहर लगेगी। फिलहाल, शिमला में राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है और सुक्खू सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे हिमाचल के अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। केंद्र के पाले में गेंद डालते हुए सरकार ने अब लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करने की तैयारी पूरी कर ली है। राज्य की जनता की नजरें भी अब इस बात पर टिकी हैं कि विधानसभा में आने वाला यह संकल्प और राज्यपाल का अभिभाषण हिमाचल के वित्तीय भविष्य की कितनी स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य के बीच यह वित्तीय टकराव और बढ़ने के आसार नजर आ रहे हैं।